रविवार, 13 जनवरी 2013

तुम मेरी जिंदगी मे



तुम मेरी जिंदगी मे आई क्यों थी ।
परछाई बनकर मेरे दिल मे समाई क्यों थी ॥
दूर जाना ही था मुझसे अगर,
तो, नजरे तुमने मुझसे लडाई क्यों थी ॥
निभाने की हिम्मत नही थी अगर ।
तो, वो झूठी कसमें खाई क्यों थी ॥
अपनी मौहब्बत से जिसे तुम ना बुझा सकी ।
आग ऐसी मेरे दिल  मे लगाई क्यों थी ॥

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

1 टिप्पणी:

  1. ham jante hai shyad apka dil tuta hai kahi, tabhi ap etna, dil ko choo lene wala ahsas shabdo m likh pate hai. aur yakin maniye ham bahut kadra karte hai...


    apki khushboo

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