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सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

काश वो चेहरे को



काश वो चेहरे को, नकाब से छिपा लेते,
ये बेहयापन दिल का दिल में ही दबा रहता।।
ये उम्र भर का रोग सीने से लग बैठा ,
ना उनका पता रहता, ना खुद का पता रहता।।

- अंकित कुमार 'नक्षत्र '

रविवार, 14 दिसंबर 2014

अंत एक दीवाने का



अंत एक दीवाने का, हुआ कुछ इस तरह ।
पेड से सूखे पत्ते, टूट जाए जिस तरह ॥
तमन्ना एक इस दिल की, थोडा प्यार पाने की ।
अपना वजूद मिटाकर भी, तेरा ऐतबार पाने की ॥

मौहब्बत में उसकी, था सब कुछ लुटा दिया ।
मैने तो उसको ही, अपनी दौलत बना लिया ॥
जिस पल इन हाथो से उसका हाथ छूट गया ।
ऐसा लगा जैसे कोई खूबसूरत, तोहफ़ा टूट गया ॥

कहा था सनम ने, ना चेहरा दिखाना कभी ।
ना ही खुद आना, ना मुझे बुलाना कभी ॥
कुछ दिन पहले वो, मिला करती थी बडी शिद्दत से ।
आज ऐसे मिली जैसे, मिली ना हो मुद्दत से ॥

कहा था उस बेवफ़ा ने, मुझे भुला देना ।
भूलकर मुझे, कही और दिल लगा लेना ॥
यादों में उसकी रोकर, कितनी रातें गुजार दी ।
दूर उससे होकर, उसकी जिंदगी सवार दी ॥

मेरे प्यार से उसका दिल, पिंघल ना सका ।
अचानक उसके वार से मै, संभल ना सका ॥
उसका घर रोशन करने को, था खुद को जला दिया ।
इन आंखों से अश्कों का, समंदर बहा दिया ॥

उसे शायद अश्कों से मेरे, मुहब्बत हो गई ।
तभी तो सब कुछ भूलकर वो, बेवफ़ा हो गई ॥
मै चाहकर भी उसे दिल से, निकाल ना सका ।
भूलकर उसे खुद को, संभाल ना सका ॥

कद्र नही थी आंसुओं की मेरे, आंखों में उसकी ।
झलकती थी नफ़रत ही फ़कत, बातों में उसकी ॥
हराकर मेरे प्यार को, जीत उसकी हो गई ।
उसकी नफरत के बीच, मेरी हस्ती खो गई ॥

नही महफ़िलें सजती अब, यारों संग पीने की ।
इच्छा नही होती अब, उसे भूलकर जीने की ॥
सनम को खोकर जीने का, हौंसला नही रहा ।
मेरे संग उसका आज, फ़ैंसला नही रहा ॥

खो दिया है यार को, अब जिंदा क्यों रहूँ ।
इतने गमों का बोझा, इस दिल पर क्यों सहूँ ।।
कभी लडखडा जाते थे, सीढ़ियां चढते हुए ।
काँपे नही कदम आज, मौत की तरफ़ बढते हुए ॥

उठाकर जहर की शीशी, होंठों से लगा ली ।
और देखते ही देखते, गलें मे समा ली ॥
छोडकर सनम को जब, ना रहा ‘नक्षत्र’ खास सा ।
बेसुध होकर गिर पडा था, सर कटी लाश सा ॥


-अंकित कुमार ‘नक्षत्र’

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

ना आएंगे कभी


ना  आएंगे कभी, उनकी नज़रो में अब हम। 
कैसे झेल पाएंगे, ये नासूर-ए-गम ।।
तमन्ना-ए-दिल, तेरी आँखों में बस जाए।  
ना हो कभी जुदा , तेरे दिल से ए-सनम ।।

-अंकित कुमार 'नक्षत्र '

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

मस्तिष्क और हृदय के मध्य द्वंद



सैंकड़ो तुफानो के मध्य घिरी जिंदगी 
दो  दिशाए मिली 
एक मस्तिष्क से और 
दूजी  ह्रदय से। 

प्रथम कहता 
छोड़ दे मोह 
सब व्यर्थ  है 
कुछ भी प्राप्त नही होगा 
दूजा कहता 
क्या कुछ पाना ही जिंदगी है 
अनमोल प्रेम का कोई मोल नही। 

किन्तु 
परन्तु 
मस्तिष्क पर भारी पड़ रहा मन 
हावी हुए हृदय के विचार 
और जिंदगी दौड़ चली 
प्रेम के पीछे 
जहा 
कुछ मिले या न मिले 
 प्रेम की लौ तो जलेगी 
छोड़  दिया सब कुछ  इसके लिए। 


मन दौड़ चला 
दिल  मचल उठा 
उसके लिए
व  उसे बताने को 
सब संभव प्रयास करूँगा अब 
चाहे कितनी कठिनाई हो 
उसे अपना बनाना है 
उसे दिल से अपनाना है। 

उसकी आँखों के सूनेपन में 
फिर से एक बार 
प्रेम की लौ देखनी है 
टुटा था जो विश्वास 
उसे जीवित कराना है 
उसे दिल से मानना है। 

-अंकित 

सोमवार, 22 सितंबर 2014

शनिवार, 20 सितंबर 2014

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

तेरे दिल से चले तो


तेरे दिल से चले तो बातो मे उलझ गए ।
जब बातो से चले तो यादों मे उलझ गए ।।

तेरे प्यार को जोडा था मैने कतरा-कतरा करके।
आज उन कतरनो में प्यार की खुद ही उलझ गए ।

सोमवार, 23 जून 2014

शनिवार, 21 जून 2014

गुरुवार, 19 जून 2014

बुधवार, 12 मार्च 2014

कभी यादों से लडे



कभी यादों से लडे, कभी बातों से लडे ।
हम तेरी झूठी मुलाकातों से लडे ॥
दीदार तेरा करने की हमे चाहत थी इस कदर,
चेहरा तेरा ढकने वाले नकाबों से लडे ॥

कभी तेरी नफ़रत को भी सीने से लगा लेते थे,
आज तेरे प्यार भरे वादों से लडे ॥
कतरा-कतरा संभालकर जिन्हे संजोया था कभी,
पलकों पे रहने वाले उन ख्वाबों से लडे ॥

तुझे पाने की चाहत थी, तुझे अपना बनाना था,
यही सोचकर तेरे झूठे जवाबों से लडे ।
तेरी चाहत को ना समझा, ना समझा खुद को ही मैने,
इसी कशमकश में अपने इरादों से लडे ॥

कभी तेरे पहलू से छूटते नही थे हम ,
आज तन्हा होकर, तन्हा रातों से लडे ॥
नज़रे कभी नज़रों से थी हटती नही 'नक्षत्र'
आज चुप रहकर भी हम आंखों से लडे ॥
-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

रविवार, 31 मार्च 2013

ना देखा कभी उसके संग


ना देखा कभी उसके संग है चांद का ढलना ।
मुश्किल से है सीखा ये हमने गिर के संभलना ॥
ना चैन है कही, ना ही आराम का सबब,
हमने तो सीखा फ़कत उसकी याद में जलना ॥
 
-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

[ 
na dekha kabhi uske sang hai chand ka dhalna
mushkil se hai sekha ye humne gir ke sambhalna
na chain hai kahi na hi aaraam ka sabab
humne to sekha fakat uski yaad me jalna

-ankit kumar 'nakshatra'

]

शनिवार, 23 मार्च 2013

कभी लडखडा जाते थे


कभी लडखडा जाते थे सीढिया चढ़ते हुए 
काँपे नहीं कदम आज मौत की तरफ बढ़ते हुए 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'
[ 'अंत  एक   दीवाने  का 'से साभार  ]

बुधवार, 6 मार्च 2013

बंधकर रहा करते थे


बंधकर रहा करते थे, तेरे पहलू में कभी 
आज  बिखरे  हवा में खुशबुओं की तरह 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

[
bandhkar rahaa karte they tere pehlu me kabhi
aaj bikhre hawa me khushbuo ki tarah
                            -ankit kumar 'NAKSHATRA'
]

शनिवार, 2 मार्च 2013

कभी तन्हाई का सहारा था


कभी तन्हाई का सहारा था, अब वो भी नहीं 'नक्षत्र'
आकर तेरी यादो ने उन्हें भी रुसवा कर दिया 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
kabhi tanhai ka sahara tha, ab vo bhi nahi 'nakshatr'
     aakar teri yado ne unhe bhi ruswa kar diya

                                   -ankit kumar 'nakshatr'
]

फिर से तेरी यादो ने


फिर से तेरी यादो ने बेबस कराना चाहा है
फिर से तेरे शहर में एक बार आना चाहा है 
उम्मीद की लौ अभी बाकी है 'नक्षत्र'
फिर से मेरे दिल ने तुझे अपना बनाना चाहा है 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
fir se teri yado ne bebas karana chaha hai
fir se tere shahar me ek baar aana chaha hai
ummeed ki lau abhi baaki hai 'nakshatr'
fir se mere dil ne tujhe apna banana chaha hai 

                                     -ankit kumar 'nakshatr'
]  

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

अभी तक झूठ से दिल को


अभी तक झूठ से दिल को, तसल्ली दी है 'नक्षत्र'
अगर सच के परदे खुले तो क़यामत होगी .

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
Abhi tak jhoot se dil ko tasalli di hai 'nakshatr'
agar sach ke parde khule to kayamat hogi.

-ankit kumar 'nakshatr'
]