रविवार, 14 दिसंबर 2014

अंत एक दीवाने का



अंत एक दीवाने का, हुआ कुछ इस तरह ।
पेड से सूखे पत्ते, टूट जाए जिस तरह ॥
तमन्ना एक इस दिल की, थोडा प्यार पाने की ।
अपना वजूद मिटाकर भी, तेरा ऐतबार पाने की ॥

मौहब्बत में उसकी, था सब कुछ लुटा दिया ।
मैने तो उसको ही, अपनी दौलत बना लिया ॥
जिस पल इन हाथो से उसका हाथ छूट गया ।
ऐसा लगा जैसे कोई खूबसूरत, तोहफ़ा टूट गया ॥

कहा था सनम ने, ना चेहरा दिखाना कभी ।
ना ही खुद आना, ना मुझे बुलाना कभी ॥
कुछ दिन पहले वो, मिला करती थी बडी शिद्दत से ।
आज ऐसे मिली जैसे, मिली ना हो मुद्दत से ॥

कहा था उस बेवफ़ा ने, मुझे भुला देना ।
भूलकर मुझे, कही और दिल लगा लेना ॥
यादों में उसकी रोकर, कितनी रातें गुजार दी ।
दूर उससे होकर, उसकी जिंदगी सवार दी ॥

मेरे प्यार से उसका दिल, पिंघल ना सका ।
अचानक उसके वार से मै, संभल ना सका ॥
उसका घर रोशन करने को, था खुद को जला दिया ।
इन आंखों से अश्कों का, समंदर बहा दिया ॥

उसे शायद अश्कों से मेरे, मुहब्बत हो गई ।
तभी तो सब कुछ भूलकर वो, बेवफ़ा हो गई ॥
मै चाहकर भी उसे दिल से, निकाल ना सका ।
भूलकर उसे खुद को, संभाल ना सका ॥

कद्र नही थी आंसुओं की मेरे, आंखों में उसकी ।
झलकती थी नफ़रत ही फ़कत, बातों में उसकी ॥
हराकर मेरे प्यार को, जीत उसकी हो गई ।
उसकी नफरत के बीच, मेरी हस्ती खो गई ॥

नही महफ़िलें सजती अब, यारों संग पीने की ।
इच्छा नही होती अब, उसे भूलकर जीने की ॥
सनम को खोकर जीने का, हौंसला नही रहा ।
मेरे संग उसका आज, फ़ैंसला नही रहा ॥

खो दिया है यार को, अब जिंदा क्यों रहूँ ।
इतने गमों का बोझा, इस दिल पर क्यों सहूँ ।।
कभी लडखडा जाते थे, सीढ़ियां चढते हुए ।
काँपे नही कदम आज, मौत की तरफ़ बढते हुए ॥

उठाकर जहर की शीशी, होंठों से लगा ली ।
और देखते ही देखते, गलें मे समा ली ॥
छोडकर सनम को जब, ना रहा ‘नक्षत्र’ खास सा ।
बेसुध होकर गिर पडा था, सर कटी लाश सा ॥


-अंकित कुमार ‘नक्षत्र’

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