GeneraL लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
GeneraL लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

मस्तिष्क और हृदय के मध्य द्वंद



सैंकड़ो तुफानो के मध्य घिरी जिंदगी 
दो  दिशाए मिली 
एक मस्तिष्क से और 
दूजी  ह्रदय से। 

प्रथम कहता 
छोड़ दे मोह 
सब व्यर्थ  है 
कुछ भी प्राप्त नही होगा 
दूजा कहता 
क्या कुछ पाना ही जिंदगी है 
अनमोल प्रेम का कोई मोल नही। 

किन्तु 
परन्तु 
मस्तिष्क पर भारी पड़ रहा मन 
हावी हुए हृदय के विचार 
और जिंदगी दौड़ चली 
प्रेम के पीछे 
जहा 
कुछ मिले या न मिले 
 प्रेम की लौ तो जलेगी 
छोड़  दिया सब कुछ  इसके लिए। 


मन दौड़ चला 
दिल  मचल उठा 
उसके लिए
व  उसे बताने को 
सब संभव प्रयास करूँगा अब 
चाहे कितनी कठिनाई हो 
उसे अपना बनाना है 
उसे दिल से अपनाना है। 

उसकी आँखों के सूनेपन में 
फिर से एक बार 
प्रेम की लौ देखनी है 
टुटा था जो विश्वास 
उसे जीवित कराना है 
उसे दिल से मानना है। 

-अंकित 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

इक बच्चे की मुस्कान का


इक बच्चे की मुस्कान का जो समझ सके ना मोल
ना कह पाए ना सुन पाए दो प्यार के मीठे बोल 
क्या कीमत इनकी बातो की क्या इनकी खुद की हस्ती है 
कुछ टुकड़े इनके सम्मुख हो तो जाते है ये डोल 

-'अंकित कुमार नक्षत्र'

[
Ek bachche ki muskaan ka jo samajh sake na mol.
na keh paaye na sun paaye do pyar ke meethe bol
kya keemat inki bato ki kya inki khud ki hasti hai
kuch tukde inke sammukh ho to jaate hai ye dol.

-ankit kumar 'nakshatr'
]  

रविवार, 27 जनवरी 2013

समंदर की लहरों से


समंदर की लहरों से क्या दुश्मनी थी 'नक्षत्र'
सब कुछ बहा कर ले गया गरीबी छोड़कर .

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
Samandar ki lehro se kya dushmani thi 'nakshatr'
sab kuchh baha ke le gayagaribi chhodkar.

-ankit kumar 'nakshatr'
]   

बुधवार, 9 जनवरी 2013

यक्ष - युधिष्ठिर संवाद ::मोबाइल संस्करण


यक्ष - युधिष्ठिर संवाद ::मोबाइल संस्करण

यक्ष ने प्रश्न किया – मनुष्य का साथ कौन देता है?
युधिष्ठिर ने कहा – मोबाइल  ही मनुष्य का साथ देता है.

यक्ष – यशलाभ का एकमात्र उपाय क्या है?
युधिष्ठिर – सबको  मैसेज करना .

यक्ष – हवा से तेज कौन चलता है?
युधिष्ठिर – नेटवर्क .

यक्ष – विदेश जानेवाले का साथी कौन होता है?
युधिष्ठिर – इंटरनेशनल रोमिंग वाला मोबाइल .

यक्ष – किसे त्याग कर मनुष्य प्रिय हो जाता है?
युधिष्ठिर – गर्लफ्रेंड के मोबाइल में बैलेंस कराने पर 
मनुष्य प्रिय हो जाता है.


यक्ष – किस चीज़ के खो जाने पर दुःख नहीं होता?
युधिष्ठिर – सिम .

यक्ष – किस चीज़ को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है?
युधिष्ठिर – मोबाइल

यक्ष – ब्राम्हण होना किस बात पर निर्भर है? जन्म पर, विद्या पर, या शीतल स्वभाव पर?
युधिष्ठिर – मोबाइल  होने पर

यक्ष – कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है?
युधिष्ठिर – डुअल सिम वाला मोबाइल  होने पर

यक्ष – सर्वोत्तम लाभ क्या है?
युधिष्ठिर –फ्री में बैलेंस का होना .

यक्ष – इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर – यहाँ 85 साल की बुढिया भी लाइफटाइम वाला सिम खरीदती है. इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

नव वर्ष मनाने आए है


नव वर्ष मनाने आए है .
हम प्यार सिखाने आए है .
जो बिगड़ गई थी विगत वर्ष ,
वो बात बनाने आए है .

सपने देखे थे जो हमने ,
वो सपने सजाने आए है। 
दुःख दर्द पुरातन भूलकर, 
आनंद मनाने आए है .

इन्द्रधनुषी रंगों की तरह,
इस जग पर छाने आए है .
भूल गए जो खुशियों के ,
वो गीत गाने आए है .

हम उजड़े घरो को छोड़कर ,
नयी बगिया बसाने आए है .
पीड़ा को मिटाकर हम सबकी ,
उन्हें दिल में समाने आए है .

अपने पराये का भेद मिटा ,
सबको अपना बनाने आए है .
इन बूढी सूनी आँखों में ,
कुछ ख्वाब सजाने आए है .

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

गुनाह-ए-अज़ीम

गुनाह-ए-अज़ीम हो गई मौहब्बत अब तो ।
आने लगी है याद कयामत अब तो ।।
ना जाने किसके पहलू में छिपकर रोएंगे हम,
सारे शहर ने की है जलालत* अब तो ॥

-----------------------
* जलालत = बेइज्ज़ती


शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

ना तीर का कोई छोर था


ना तीर का कोई छोर था ।
ना ही दिल का कोई छोर था ।।
वो तीर दिल में चुभाते चले गए ।
हम दर्द को दिल में समाते चले गए ।।
उनकी तमन्ना हमारे चेहरे पर दर्द आए ।
जकड जाए हम, आंखे सर्द हो जाए ॥
दर्द खंज़र से नही, उनकी बेरुखी से था ,
मगर क्या करे 'अंकित' को प्यार भी उन्ही से था ॥
वो इक बार मुस्कुरा कर तो कहते हमसे,
आंसूं तो क्या, दर्द-ए-लहू बहाते दिल से ॥
तमन्ना उनकी-औ-हमारी दिल में ही रह गई ।
हम मुस्कुराते रहे, वो देखती रह गई ॥

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

क्यों, आखिर क्यों



एक शहर ,
सब अंजान,
बनते है ये दिलवाले,
लेकिन नफ़रत ओढे हुए।
क्यों,
आखिर क्यों,
क्या यही दस्तूर है इस शहर का ।

एक मोहतरमा,
कुछ जानी-पहचानी,
बाते करती है आंखों से,
लेकिन नज़रे हिकारत भरी ।
क्यों,
आखिर क्यों,
क्या यही शउर है इस शहर का ।

एक दीवाना,
कुछ बेगाना सा,
मुस्कान को लपेटे हुए,
और लोग उसे पत्थर मारे ।
क्यों,
आखिर क्यों,
क्या यही नासूर है इस शहर का ।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

हमारी राष्ट्रीय भाषा



हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा हैं । अगर आप उत्तर भारत मे रहते है तो बेशक आपको लगेगा कि हिंदी ही हमारी राष्ट्रीय भाषा हैं । लेकिन दक्षिण भारत मे जाने के बाद आप सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या हिंदी ही हमारी राष्ट्रीय भाषा हैं ? क्योंकि आपको वहां हिंदी में कुछ लिखा नही मिलेगा । वहां पर केवल अंग्रेजी या फ़िर कोई क्षेत्रीय भाषा प्रयोग मे लाई जाती है । और अगर हिंदी मे कुछ लिखा भी होगा तो वो कुछ इस तरह होगा कि आपको अफ़सोस होगा कि हमारी राष्ट्रीय भाषा का ऐसा अपमान । इससे अच्छा तो यही है कि अगर आपको हिंदी नही आती, तो आप उसका प्रयोग ना करें ।