गुरुवार, 7 मार्च 2013

प्रेम-पत्र 6


पलक,
                प्रात काल जब तुम्हारी मीठी सी मनमोहक मुस्कान के साथ दिन का आरंभ होता है तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे अंधेरी गलियों में हजारों दिए प्रज्वलित हो उठे हो और उन जगमग जगमग दीयों के मध्य मेरी कल्पनाए तुम्हारे संग नृत्य करने लगती है ।
                जब कभी तुम्हारे विषय में सोचता हूं तो विचारों की एक अंतहीन श्रृंखला शुरु हो जाती है । कभी तुम्हारी बातें याद आती है कभी तुम्हारे संग मुलाकाते, कभी तुम्हारा छेडना याद आता है , और कभी रूठना मनाना याद आता है । तुम्हारी यादों मे खोए हुए कब सुबह से शाम होती है , कब दिन निकलता है, कब रात रात होती है, कुछ भी मालूम नही पडता ।
                पलक, तुम मेरा वर्तमान हो और भविष्य भी । तुम्हारे संग चलने के जो ख्वाब मैने देखे है, उन्हे टूटने मत देना । उन दिवास्वप्नों के सहारे भी मै अपना संमपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकता हूं बशर्ते तुम मेरे संग रहो । जब तुम्हारी आंखों में अपनी परछाई बनते हुए देखता हूं, तो दिल में सुकून की एक लहर दौड जाती है और तुम्हारी प्रेम्पूर्ण बातों का स्मरण करके मेरा मन प्रफ़ुल्लित हो उठता है ।
-'नक्षत्र'
[
 Palak,
    prat: kaal jab tumhari meethi si manmohak muskaan ke saath din ka aarambh hota hai, to aisa prateet hota hai ki andheri galiyo me diye prajwalit ho uthey ho aur un jagmag jagmag diyo ke madhya meri kalpnaye tumhare sang nratya karne lagti hai.
   
    Jab kabhi tumhare vishay me sochta hu, to vicharo ka ek antheeen silsila shuru ho jaata hai. kabhi tumhari baatey yaad aati hai, kabhi tumhare sang mulakaatey, kabhi tumhara chhedna yaad aata hai , kabhi roothna manaana yaad aata hai. Tumhari yaado me khoye hue kab subah se shaam hoti hai, kab din nikalta hai, kab raat hoti hai, kuch bhi maaloom nahi padta.

    palak, tum mera vartmaan ho aur bhavishaya bhi. tumhare sang chalne ke jo khwab maine dekhe hai, unhe tootne mat dena. un diwaswapno ke sahare hi mai apna sampurn jeevan guzaar sakta hu, basharte tum mere sang raho. jab tumhari aankho me apni parchaai bante hue dekhta hu, to dil me sukoon ki ek lahar daud jati hai. tumhari prempurna baato ka smaran karke mera man romanchit ho uthta hai.


-'nakshatra'
]

बुधवार, 6 मार्च 2013

बंधकर रहा करते थे


बंधकर रहा करते थे, तेरे पहलू में कभी 
आज  बिखरे  हवा में खुशबुओं की तरह 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

[
bandhkar rahaa karte they tere pehlu me kabhi
aaj bikhre hawa me khushbuo ki tarah
                            -ankit kumar 'NAKSHATRA'
]

प्रेम-पत्र 5


पलक,
         ना जाने कितनी बार दिल दुखाया होगा तुम्हारा । कितनी बार कोशिश करता हूं कि मै कुछ भी ऐसा ना करूं जिससे तुम्हे दुख पहुंचे, किंतु हर बार कोई ना कोई ऐसी घटना घट ही जाती है जिसके कारण तुम्हारे ह्रदय को दुख पहुंचता है ।  ऐसा भी नही है कि तुम्हे कष्ट पहुंचाकर मुझे अच्छा लगता है । मै खुद शायद तुमसे भी ज्यादा परेशान हो जाता हूं  ।
        ''आपके कारण मेरी जिंदगी परेशानियों का घर बन चुकी है ।' तुम्हारे ये शब्द ऐसे प्रतीत हुए थे जैसे किसी ने पिंघला हुआ शीशा मेरे कानों में उडेल दिया हो । इसके पश्चात तुम्हारे मुख से कुछ भी सुनने की हिम्मत नही रही थी । क्या तुम्हारी जिंदगी मेरे कृत्यों के कारण  वास्तव में बोझिल हो गई है या इसका कुछ और कारण है ? तुम्हारा परिवर्तित व्यवहार भी कभी कभी मुझे आशंकित कर देता है । पहले तो तुम ऐसी नही थी , शायद तुम्हारे बदले हुए व्यवहार का दोषी भी मै ही हूं  ।
        पलक, क्या मै तुम्हारे योग्य नही हूं ? और अगर ऐसा है तो तुमने मुझसे प्रेम क्यों किया था ?  प्रेम योग्यता-अयोग्यता नही देखता । प्रेम होने के बाद तो अयोग्य को ही योग्य बनाने का प्रयत्न किया जा सकता है , इसके अलावा कोई विकल्प शेष नही होता ।
        तुम चाहे मुझसे दूर जाने की कितनी भी कोशिश कर लो, किंतु मेरा मन कहता है कि तुम मुझसे दूर नही रह सकती, तुम्हारा दिल मुझसे मिलने को, मुझे देखने को , मेरी आवाज सुनने को विवश हो जाएगा और तुम मुझसे मिलने के लिए तडप उठोगी । मुझसे दूर रहना तुम्हारे वश की बात नही है पलक । तुम्हारी आंखों मे जो प्रेम, जो बेचैनी, जो विवशता, जो समर्पण मैने देखा है और महसूस किया है, वो मिथ्या नही था और ये देखने के बाद मुझे नही लगता कि तुम्हारे लिए मेरे बिना रहना संभव है ।
    अलविदा पलक अलविदा ।
 

-तुम्हारा और सिर्फ़ तुम्हारा 'नक्षत्र'



[
palak,
    na jane kitni baar dil dukhaya hoga tumahara? kitni baar kosish karta hu ki mai kuch bhi aisa na karu jis se palak ko dukh pahunche, kintu har baaar koi na koi aisi ghatna ghat hi jati hai jiske karan tumhare hradya ko dukh pahuncta hai.aisa bhi nahi hai ki tumhe kasta pahunchakar mujhe achcha lagta hai. Mai khud shayad tumse bhi jyada pareshaan ho jaata hu.


    " Aapke karan meri jindagi pareshaniyo ka ghar ban chuki hai." tumhare ye shabd aise prateet hue they jaise kisi ne pinghla hua sheesha mere kanko me udel diya ho. Iske paschat tumhare mukh se kuch bhi sun ne ka saahas nahi raha tha. Kya tumhari jindagi mere kratyo ke karan bojhil ho gayi hai ya iska kuch aur karan hai ? Tumhara badla hua vyavahar bhi kabhi kabhi mujhe aashankit kar deta hai. pehle to tum aisi nahi thi. shayad tumhare badle hue vyavahar ka doshi bhi mai hi hu.
   
    palak, kya mai tumhare yogya nahi hu? aur agar aisa hai to tumne mujhse prem kyo kiya tha? prem yogyata-ayogyata nahi dekhta. prem hone ke baad to ayogya ko hi yogya banaane ka prayas kiya ja sakta hai. iske alawa koi aur vikalp shesh nahi hota.

    Tum chahe mujhse kitne bhi door jaane ki koshish kar lo, kintu mera man jaanta hai ki tum mujhe door nahi reh sakti, tumhara dil mujhse milne ko vivash ho jayega aur tum mujhse milne ke liye tadap uthogi. mujhse door rehna tumhare vash ki baat nahi hai palak. tumhari aankho mai jo prem, jo baichaini, jo vivasta , jo samarpan maine apne liye dekhi hai aur mehsoos kiya hai wo mithya nahi tha, uske baad mujhe nahi lagta ki tumhare liya mere bina rehna sambhav hai.


    alvida palak alvida.
-tumhara aur sirf tumhara 'Nakshatra'
]

शनिवार, 2 मार्च 2013

पलकों में बसाना चाहता हूँ


पलकों में बसाना चाहता हूँ 
तुझे दिल में बसाना चाहता हूँ
है इच्छा मेरे मन की तुझे
सीने से लगाना चाहता हूँ
जो ख्वाब तेरी आँखों में थे 
मै उनको सजाना चाहता हूँ
गलियों में तेरे दिल की मै 
घर अपना बनाना चाहता हूँ
जुड़कर साँसों से तेरी, तुझे,
साँसों में समाना चाहता हूँ
-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
Palko me basana chahta hu
tujhe dil me  basana chahta hu
hai ichchha mere man ki tujhe
seene se lagaana chahta hu
jo khwab teri aankho me they
mai unko sajaana chahta hu
galiyo me tere dil ki mai
ghar apna banaana chahta hu
judkar saanso se teri, tujhe, 
saanso me samaanaa chahta hu
-ankit kumar 'nakshatr'
]

कभी तन्हाई का सहारा था


कभी तन्हाई का सहारा था, अब वो भी नहीं 'नक्षत्र'
आकर तेरी यादो ने उन्हें भी रुसवा कर दिया 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
kabhi tanhai ka sahara tha, ab vo bhi nahi 'nakshatr'
     aakar teri yado ne unhe bhi ruswa kar diya

                                   -ankit kumar 'nakshatr'
]

फिर से तेरी यादो ने


फिर से तेरी यादो ने बेबस कराना चाहा है
फिर से तेरे शहर में एक बार आना चाहा है 
उम्मीद की लौ अभी बाकी है 'नक्षत्र'
फिर से मेरे दिल ने तुझे अपना बनाना चाहा है 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
fir se teri yado ne bebas karana chaha hai
fir se tere shahar me ek baar aana chaha hai
ummeed ki lau abhi baaki hai 'nakshatr'
fir se mere dil ne tujhe apna banana chaha hai 

                                     -ankit kumar 'nakshatr'
]  

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

प्रेम -पत्र 4



        पलक, तुम्हारे साथ बिताए हुए चंद लम्हों को मैने अपने पहलू में समेटकर रख लिया है । कितने मादक, कितने मनमोहक, कितने प्रेमपूर्ण थे वो क्षण, जब हम दोनों एक दूसरे के इतने समीप थे कि सांसों से सांसे टकरा रही थी, नज़रे एक-दूसरे में डूबने की कोशिश कर रही थी, धडकनें इतनी तीव्र हो गई थी कि मानो एक-दूसरे से प्रतियोगिता कर रही हो और हम प्रेम के सागर मे खोते जा रहे थे । कभी तुम्हारी प्यार भरी मुस्कान याद आती है तो कभी तुम्हारा छुप-छुपकर मुझे निहारना । उन क्षणों ने मुझे एक ऐसे अदृश्य बंधन में बांध दिया है कि जितना तुमसे दूर जाता हूं, उतना ही तुम्हे अपने निकट पाता हूं  ।
ये प्रेम जो मेरे ह्रदय में तुम्हे दिखाई पडता है, ये ना तो किसी कल्पना की उडान है और ना ही कोई आकर्षण; ये प्रेम तो तुम्हारे प्रेम के प्रभाव से मेरे ह्रदय में उत्पन्न हुआ है । तुम्हारे प्यार के सम्मुख मै सब कुछ मिटा देना चाहता हूं , यहां तक कि खुद को भी या फ़िर यूं कहो कि खुद को तुम्हारी यादों में भुला देना चाहता हूं । 
        कभी तुम्हारी झूठी कसम खाई थी, आज जब वो याद आया तो ऐसा लगा जैसे मेरा सीना चीर दिया गया हो । मेरा दिल तडप उठा ये सोचकर कि मैने ये भी किया । किंतु आज तुमसे कुछ भी छिपाने का ख्याल भी नही आता । यही इच्छा होती है को तुम्हारे सम्मुख पूरी तरह से खुल जाऊं, तुम्हारे मेरे बीच कोई परदा, कोई ओट, कोई व्यवधान ना रहे । सिर्फ़ तुम हो और मै होऊं; और ये दुनिया हम दोनों में सिमट कर रह जाये । किसी रात तेरी जुल्फ़ों की छांव में सिर रखकर सो जाऊं और उस रात की कभी सुबह ना हो । 
तुम्हारे मेरे संग होने के विचार मात्र से ही मेरा मन-मयूर प्रफ़ुल्लित होने लगता है । ऐसे प्रतीत होता है कि जैसे फ़िर से वृक्ष हरे-भरे हो गए है, फ़िर से सूखी नदियों में जल प्रवाहित होने लगा है, फ़िर से बंज़र जमीन पर फ़सले लहलहा उठी है, फ़िर से वनों में पशु-पक्षी नृत्य करने लगे है और फ़िर से ये 'नक्षत्र' एक नया जीवन पा गया है ।


जाते-जाते ये नज्म तुम्हारे लिए;
"कभी तमन्ना थी तुमसे दूर जानें की 'नक्षत्र' ।
आज मिटे जाते है आगोश मे तेरे सिमटने को ॥"

-तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा 'नक्षत्र'

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

इक बच्चे की मुस्कान का


इक बच्चे की मुस्कान का जो समझ सके ना मोल
ना कह पाए ना सुन पाए दो प्यार के मीठे बोल 
क्या कीमत इनकी बातो की क्या इनकी खुद की हस्ती है 
कुछ टुकड़े इनके सम्मुख हो तो जाते है ये डोल 

-'अंकित कुमार नक्षत्र'

[
Ek bachche ki muskaan ka jo samajh sake na mol.
na keh paaye na sun paaye do pyar ke meethe bol
kya keemat inki bato ki kya inki khud ki hasti hai
kuch tukde inke sammukh ho to jaate hai ye dol.

-ankit kumar 'nakshatr'
]  

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

अभी तक झूठ से दिल को


अभी तक झूठ से दिल को, तसल्ली दी है 'नक्षत्र'
अगर सच के परदे खुले तो क़यामत होगी .

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
Abhi tak jhoot se dil ko tasalli di hai 'nakshatr'
agar sach ke parde khule to kayamat hogi.

-ankit kumar 'nakshatr'
]   

तुम तो मिट्टी के खिलौनों से



तुम तो मिट्टी के खिलौनों से खेला करती थी ।
लोगों के दिलों से खेलना कब सीखा तुमने ॥

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

[
Tum to mitti ke khilono se khela karti thi.
logo ke dilo se khelna kab seekha tumne.

-ankit kumar 'nakshatr'
]  

रविवार, 27 जनवरी 2013

समंदर की लहरों से


समंदर की लहरों से क्या दुश्मनी थी 'नक्षत्र'
सब कुछ बहा कर ले गया गरीबी छोड़कर .

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'


[
Samandar ki lehro se kya dushmani thi 'nakshatr'
sab kuchh baha ke le gayagaribi chhodkar.

-ankit kumar 'nakshatr'
]   

बुधवार, 23 जनवरी 2013

मेरे अरमां दिल में रहे


मेरे अरमां दिल में रहे, पूरे ना हो सके 
वो बदनुमा दाग कभी दिल से ना धो सके 
तड़पते रहे दिल ही दिल में उन्हें देखकर
हम उनकी यादो में जी भर के ना रो सके 
प्यार में दे देते हम, जान भी, मगर, 
तेरे दिए गमों का बोझा हम ना ढो सके 
ना जाना छोड़कर मुझे, इक बात मान ले 
कहाँ से लाँऊ हौंसला कि तुझको खो सके 
जागती आँखों से सपने देखने लगे 
भूलकर फिर ख्वाब तेरा, हम ना सो सके 

- अंकित कुमार 'नक्षत्र'

शनिवार, 19 जनवरी 2013

रखा था अपने पहलू में


रखा था अपने पहलू में कितना संभालकर .
कैसे जलाऊ यादो को उसकी दिल से निकलकर 
हर कदम एहतियाती* था बर्बादी का मेरी 
शक भी नहीं हुआ हमे कातिल की चाल पर .

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'
----------------
*एहतियाती = सोचा-समझा 

बुधवार, 16 जनवरी 2013

पलकों से गिरी बूंदों की


पलकों से गिरी बूंदों की क्या कीमत तुम्हारी नजरो में 
तुम तो इन मोतियों से अपना जी बहलाया करती हो 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

दिल तो मजबूर है


दिल तो मजबूर है तेरी यादो में जलने के लिए 
तूने दिया नासूर मुझे, तिल-तिल मरने के लिए 
सहारा चाहे तेरा हो या हो तेरी यादो का,
मै हूं लाचार बहुत, तुझसे प्यार करने के लिए .

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

सोमवार, 14 जनवरी 2013

आंखे छलक आती है



आंखे छलक आती है पैमाने की तरह ।
हुए घायल शिकारी के निशाने की तरह ।
आशिक बने प्यार में दीवाने की तरह ।
डूब गए प्यार मे मयखाने की तरह ।
सुने गए उनके किस्से फ़साने की तरह ।
हम रह गए फ़सानों में बेगाने की तरह ।
तुमको तो मिल गया प्यार तुम्हारा, और,
नक्षत्र  रह गया अकेला, अंजाने की तरह ॥

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

रविवार, 13 जनवरी 2013

हुआ जब किस्सा-ए-दिल



हुआ जब किस्सा-ए-दिल आम तुम्हारा ।
नही तसव्वुर* में कोई काम तुम्हारा ॥
पूछा जब दोस्तों ने कातिलों का नाम ।
आया जबां पे फ़कत** बस नाम तुम्हारा ॥

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'
--------------
*तसव्वुर= कल्पना, **फकत = केवल 

तुम मेरी जिंदगी मे



तुम मेरी जिंदगी मे आई क्यों थी ।
परछाई बनकर मेरे दिल मे समाई क्यों थी ॥
दूर जाना ही था मुझसे अगर,
तो, नजरे तुमने मुझसे लडाई क्यों थी ॥
निभाने की हिम्मत नही थी अगर ।
तो, वो झूठी कसमें खाई क्यों थी ॥
अपनी मौहब्बत से जिसे तुम ना बुझा सकी ।
आग ऐसी मेरे दिल  मे लगाई क्यों थी ॥

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

कभी खुदा को माना


कभी खुदा को माना था, फिर उसे माना 
आज तनहा होकर है टूट गया 'नक्षत्र'

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

मज़बूरियों का आलम



मज़बूरियों का आलम कुछ इस कदर है सादिक ,
चाहकर भी तेरे शहर से रिश्ता ना तोड पाऊंगा ।

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

बुधवार, 9 जनवरी 2013

यक्ष - युधिष्ठिर संवाद ::मोबाइल संस्करण


यक्ष - युधिष्ठिर संवाद ::मोबाइल संस्करण

यक्ष ने प्रश्न किया – मनुष्य का साथ कौन देता है?
युधिष्ठिर ने कहा – मोबाइल  ही मनुष्य का साथ देता है.

यक्ष – यशलाभ का एकमात्र उपाय क्या है?
युधिष्ठिर – सबको  मैसेज करना .

यक्ष – हवा से तेज कौन चलता है?
युधिष्ठिर – नेटवर्क .

यक्ष – विदेश जानेवाले का साथी कौन होता है?
युधिष्ठिर – इंटरनेशनल रोमिंग वाला मोबाइल .

यक्ष – किसे त्याग कर मनुष्य प्रिय हो जाता है?
युधिष्ठिर – गर्लफ्रेंड के मोबाइल में बैलेंस कराने पर 
मनुष्य प्रिय हो जाता है.


यक्ष – किस चीज़ के खो जाने पर दुःख नहीं होता?
युधिष्ठिर – सिम .

यक्ष – किस चीज़ को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है?
युधिष्ठिर – मोबाइल

यक्ष – ब्राम्हण होना किस बात पर निर्भर है? जन्म पर, विद्या पर, या शीतल स्वभाव पर?
युधिष्ठिर – मोबाइल  होने पर

यक्ष – कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है?
युधिष्ठिर – डुअल सिम वाला मोबाइल  होने पर

यक्ष – सर्वोत्तम लाभ क्या है?
युधिष्ठिर –फ्री में बैलेंस का होना .

यक्ष – इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर – यहाँ 85 साल की बुढिया भी लाइफटाइम वाला सिम खरीदती है. इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?

ख्वाब बनकर आए थे


ख्वाब बनकर आए थे, ज़िन्दगी में वो 'नक्षत्र' कभी 
आज तक हकीकत से, परदा किये बैठे है 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

आशिकी हज़ार करने


आशिकी हज़ार करने आयेंगे यहाँ, मगर, 
दिया-ए-मोहब्बत दिल में जलने वाला नहीं है।

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

अश्कों में भीगना पडा मुझे



अश्कों में भीगना पडा मुझे ,
जब तुझको छोडना पडा मुझे ।
दो आंख लडी थी क्या तुमसे ,
सब नाता तोडना पडा मुझे ।
दूं दर्द तुझे तो दूं कैसे ,
दिल खुद का तोडना पडा मुझे ।
रखकर पत्थर दिल पर अपने ,
मुंह तुझसे मोडना पडा मुझे ।
छिपकर सुनसान अंधेरों में,
गम से नाता जोडना पडा मुझे ।

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

आँखों का इशारा पाने को


आँखों का इशारा पाने को, बेसब्र रहा करते थे कभी 
आज हमारी चीख भी गुमनाम हुई उनके लिए 

-अंकित 'कुमार नक्षत्र'