शनिवार, 29 सितंबर 2012

दीवानगी उनकी


हालात बद से बदतर होते चले गए ।
हम तेरे प्यार में खोते चले गए ॥
तुम मेरी दीवानगी के हो गए थे कायल ।
क्यों मेरी नज़रों से दूर होते चले गए ॥
इंतज़ार तेरा कुछ इस तरह से किया है ।
आंखें खोलकर भी हम सोते चले गए ॥
जुदाई से तेरी, हालात बने कुछ ऐसे ।
हम खुद को अश्कों में डुबोते चले गए ॥
जब आंखें भी तेरी तरह हो गई बेवफ़ा ।
हम दिल के सहारे ही रोते चले गए ॥
खुदा से भी बढकर तुझे चाहा था हमनें ।
सारे अरमां दिल मे दफ़न होते चले गए ।।
तुमने तो वापस मुडकर भी नही देखा, और,
हम अंजान हाथों कत्ल होते चले गए ॥

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

आख़िरी पैगाम


यामत के दिन नज़दीक है शायद
कातिलों की जुबां पे मेरा नाम गया
यादों ने मेरी तकल्लुफ़ किया होगा उन्हे
एक खत आज फ़िर बेनाम गया
जाने कितने दिन की बची है ज़िन्दगी
आज फ़िर मौत का पैगाम गया
जीना तो भूल गये थे उनकी जुदाई से
आज शायद आखिरी अंजाम गया
खंज़र जो चुभाया उसने मेरे सीने मे
दर्द --दिल को मेरे भी आराम गया

सोमवार, 24 सितंबर 2012

और बात होती


हम तो तेरी गलियों मे आते ही रहते है ।
अगर तुम मेरे दर पे आते, तो और बात होती ॥
लोग तो हमको समझाते ही रहते है ।
अगर तुम हमे समझाते, तो और बात होती ॥
दर्द तो दुनिया से मिलता ही रहता है।
अगर तुम दिल दुखाते तो और बात होती ॥
लोग तो हमको सताते ही रहते है ।
अगर तुम हमे रुलाते तो और बात होती ॥
मौत तो हमको भी आनी है एक दिन ।
अगर तुम कत्ल कराते , तो और बात होती ॥


शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

स्वीटी-पुन:आगमन


ना जाने कितने दिनो बाद आज कुछ लिखने का दिल किया, जी मे आया कि अपनी भावनाओं को, अपने ज़ज़्बातों को शब्दों मे उकेर दूं । 

स्वीटी वापस आ गई है, उसे आना ही था । आखिर कब तक कोई अपने प्रेमी से बिछुड कर रह सकता है । जब वो वापस आई, ऐसा लगा जैसे वर्षों के प्यासे को अमृत-कलश मिल गया हो, जैसे सदियों से बंजर जमीन मे अचानक हरी-भरी फ़सल लहलहा उठी हो, जैसे गर्म रेत पर पडी तडप रही मछली को किसी ने वापस समुद्र मे फ़ेंक दिया हो । वो क्यों वापस आई, ये जानने की मैने कोई कोशिश नही की । उसका वापस आना ही मुझे सुकून दे रहा था ।

स्वीटी ने मुझसे पूछा कि क्या मै अभी भी उससे प्यार करता हूं । मै उसे कैसे समझाऊ कि प्यार एक अहसास होता है, जो होने को तो पल भर मे हो सकता है, और अगर ना हो तो सदियां बीत जाए । ये अहसास तो मुझे तुम्हे देखकर ही हो गया था । मै तभी से इस अहसास को दिल में समाए हूं । तुम मुझसे प्यार के बारे मे पूछती हो । जहां प्यार होता है, वहां सिर्फ़ प्यार ही होता है, नफ़रत के लिए कोई स्थान नही होता और अगर नफ़रत होती भी है तो इसका अर्थ यही है कि वहां प्यार था ही नही, नफ़रत दबी हुई थी कही गहरे मे, जो अब सामने आई है ।

लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कुछ खो सा गया है । स्वीटी कुछ बदली-बदली सी लग रही है । नही, ये वो स्वीटी नही है, जिसे मैने प्यार किया था, जिसकी तस्वीर को मै सीने से लगाकर रखता था, जिसके शब्द मेरे कानों मे बारम्बार गूंजते रहते थे, जिसकी यादे, भरी महफ़िल मे भी मेरा पीछा नही छोडती थी, जिसकी सांसों की आवाज़ और दिल की धडकन को मै अच्छे से पहचानता था । 

ना जाने क्यों उससे मिलकर भी मै उससे मिल नही पाया, उसे देखकर भी देख नही पाया, उसे सुनकर भी सुन नही पाया । मै चाहकर भी उसके लिए प्यार को महसूस नही कर पाया । उसके जाने के बाद शायद कुछ टूट सा गया है मुझमे, जो चाहकर भी जुड नही पाता । एक उदासी घर कर गई है इस दिल में । अब तो तमन्ना ही खो गई है किसी को प्यार करने की या किसी का प्यार पाने की । 

मै नही चाहता कि इतिहास की पुनरावृत्ति हो और मै फ़िर से दु:ख के बादलों से घिर जाऊँ । मन कुछ ऐसा कहता है कि अच्छा होगा अगर स्वीटी वापस चली जाए तो । वो आई तो वापस जाने के लिए ही है, तो मै क्यों कुछ दिन के लिए अपने दिल को बहलाऊं, क्यो फ़िर से वही दर्द, वही तडप, वही उदासी झेलूं, जिससे मै बडी मुश्किल से उबर पाया हूं । 

शायद स्वीटी के मन मे अपराधबोध है, उसे ऐसा लगता है कि उसने मेरा दिल तोडा है । मै उससे बेपनाह मुहब्बत करता था और उसने मुझे ठुकरा दिया, मेरी कद्र नही की । लेकिन इस कारण से मेरे मन मे उसके प्रति कोई द्वेष भावना नही है । वैसे भी सच्ची मुहब्बत के कद्रदान आजकल मिलते कहाँ है । स्वीटी ने मुझसे कहा कि मै उसे माफ़ कर दूं । मगर मै तो समझ ही नही पाया कि किस बात के लिए । माफ़ तो मै तब करता, जब मुझे लगता कि उसने कुछ गलत किया है । गलत तो मै था स्वीटी जो तुमसे मौहब्बत कर बैठा । 

स्वीटी मेरी तुमसे एक ही विनती है कि जितनी जल्दी हो सके, मुझसे और मेरी दुनिया से दूर, इतनी दूर चली जाओ कि मै  पुकारुं भी तो तुम सुन ना सको और ना ही तुम कभी वापस आ सको । अगर तुम वास्तव मे चाहती हो कि मै खुश रहूं तो मेरी नज़रों से हमेशा दूर ही रहना । अगर तुम मुझे दिखोगी तो मेरे दिल मे तुम्हे पाने के लिए हलचल होगी और फ़िर वही सब होगा जिसके बारे मै सोचने भर से ही मेरी रूह काँप उठती है । 
अलविदा स्वीटी, अलविदा । 

जाते-जाते इक शे'र तुम्हारे लिए………

तुम भूल जाओ हमको, ये हक है तुम्हे ।
मेरी बात और है, मैने तो मौहब्बत की है ॥

रविवार, 1 जुलाई 2012

याद करते है तुम्हे आहो में ।



याद करते है तुम्हे आहो में ।
काश तुम भी होते हमारी बाहों में ॥
ज़ो चाहा वो तो मिल नही पाया ।
और तुम रह गए सिर्फ़ हमारी निगाहो में ॥

कभी याद जो तेरी आती है



कभी याद जो तेरी आती है,
आंखे सागर बन जाती है । 
भटका जाता हूं गलियों में,
फ़ूलो-बागों मे, कलियों में । 
क्या कहता है ये दिल मेरा,
क्यूं रोता है ये दिल मेरा । 
जब दर्द गुजर हद से जाता,
तेरी गलियों में हूं आता । 
दीदार करा दे गर मुझको,
मै जान भी दे दूंगा तुझको । 
मेरे बारे मे कुछ सोच जरा,
मेरे अश्कों को तू पोंछ जरा । 
मेरे दिल की एक तमन्ना है,
मुझे तेरा चेहरा बनना है ।

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

स्वीटी - अंतिम विदाई


नफ़रत हो गई है तुमसे मुझे । सब कुछ झेलने को तैयार था मै तुम्हारे लिये । लेकिन आज़ ना जाने क्यूं तुमसे इतनी नफ़रत, इतनी घृणा हो गई है कि तुम्हारे नाम तक को देखना मुझे पसंद नही । एक बार मै एक पंडित से मिला था । उसने मेरे बारे मे कुछ बाते बताई थी और अंत में कहा था "तुम हर काम मे अति करते हो । ये तुम्हारे लियें बहुत हानिकारक होगी । "पंडित के इन आखिरी शब्दों से मै पूर्णरूपेण सहमत था । मै जानता हूं कि जब मै किसी को चाहता हूं तो कुछ इस तरह से कि उसके अलावा मेरे लिये कोई अहमियत नही रखता और अगर भूलता हूं तो ऐसे कि जैसे उसका कोई अस्तित्व ही नही था । और अब मै तुम्हे भी ऐसे ही भूल जाना चाहता हूं ।

"ना आना तुम कभी मेरी नज़रों के सामनें ।।
कुछ ना बचा इन आंखो में, नफ़रत के सिवा ॥"

लेकिन ये सब मै तुमसे क्यों कह रहा हूं । तुम में तो भावनाए ही नही है, दिल की बातों को समझने वाला दिल ही नही है, तुम तो हो ही पत्थर दिल । यही कहती थी ना तुम अपने बारे मे । अब तुम मुझे देखना कि मै कैसा पतथर दिल बनता हूं । ना तो मै तुम्हारा चेहरा देखना चाहता हूं और ना ही तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहता हूं । तुम्हारी हर याद को मिटा दूंगा मै इस दिल से ।

इक वो भी दिन थे अब मै तुमसे प्यार करता था और इतना करता था कि तुम्हारे लिये कुछ भी करने को तैयार था, किसी भी हद से गुजरने को तैयार था । लेकिन अब वो समय शायद ही आए । अब तो इस दिल मे तुम्हारे लिये सिर्फ़ नफ़रत ही बची है ।

शायद मै ही पागल था जो तुम्हे पागलपन की हद तक चाहता था । परंतु अब मै सब कुछ भुला देना चाहता हूं । मै इस दिल को ऐसा पत्थर बना देना चाहता हूं कि कोई आए या जाए, मरे या जिए, इस पर कोई फ़र्क ना पडे ।

"कभी भी , किसी पर भी ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास नही करना चाहिये ; क्योंकि अगर वही इंसान तुम्हारा विश्वास तोड दे तो संभलने की भी हिम्मत ना रहेगी तुममें ।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

हमारी राष्ट्रीय भाषा



हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा हैं । अगर आप उत्तर भारत मे रहते है तो बेशक आपको लगेगा कि हिंदी ही हमारी राष्ट्रीय भाषा हैं । लेकिन दक्षिण भारत मे जाने के बाद आप सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या हिंदी ही हमारी राष्ट्रीय भाषा हैं ? क्योंकि आपको वहां हिंदी में कुछ लिखा नही मिलेगा । वहां पर केवल अंग्रेजी या फ़िर कोई क्षेत्रीय भाषा प्रयोग मे लाई जाती है । और अगर हिंदी मे कुछ लिखा भी होगा तो वो कुछ इस तरह होगा कि आपको अफ़सोस होगा कि हमारी राष्ट्रीय भाषा का ऐसा अपमान । इससे अच्छा तो यही है कि अगर आपको हिंदी नही आती, तो आप उसका प्रयोग ना करें ।



रविवार, 20 नवंबर 2011

स्वीटी… (सिर्फ यादें )


स्वीटी…

जब इस दिल के किसी कोने में तुम्हारी याद का दिया ज़गमगाता है, तो मेरा पूरा वजूद बस तुम पर सिमट कर रह जाता है । देखता हूं तो तुम्हारा चेहरा, सोचता हूं तो तुम्हारी बातें । तुम्हारी याद एक धुंधली सी तस्वीर से शुरु होती है । उसी चेहरे की तस्वीर, जिसे पहली बार इन निंगाहों ने देखा था और उम्र भर के लिये अपने दिल मे कैद कर लिया था । वही तस्वीर, जिसका ख्याल तक अगर दिल में आ जायें, तो हाथ खुद-ब-खुद दिल को सम्भालने के लिये उठ जाते है । या फ़िर यूं कहो कि……

तेरा दीदार करते ही रब का ख्याल आया ॥
अब ना कोई हसरत बाकी रही दिल में ॥

कैसे कोई इंसान सिर्फ़ यादों के सहारे सारी उम्र गुजार सकता है । यकीन नही होता ना । मुझे भी नही होता था । लेकिन अब सोचता हूं कि कितना गलत था मै । यादें बहुत खूबसूरत होती है । तो क्या उनके साथ ज़िंदगी नही बितायी जा सकती ।

ज़िंदगी तो तभी ज़ी चुके हम ॥
जब नज़र भर के देखा था उन्होने ॥

अब तो बस जी रहे है, यूं ही । शायद कभी उन्हे अहसास हो हमारे दीवानेपन का । और वो लौट आए हमारी बांहों में । खुदा जाने क्या लिखा है हमारी किस्मत में, उनका दीदार या फ़िर इन्तज़ार, इन्तज़ार और सिर्फ़ इन्तज़ार…………।
अब इस दिल का हाल ना पूछो, मुझसे कुछ कहा नही जाता । आखिर क्यों होता है ऐसा ? क्यों कोई दिल में इस तरह से समा जाता है कि किसी और के लिये जगह ही नही बचती । क्यों उसकी यादों को सीने से लगाए बैठा हूं मै, ये जानते हुए भी कि इस राख के ढेर में कुछ भी नही मिलने वाला । लेकिन क्या सिर्फ़ किसी को हासिल कर लेने को ही प्यार कहते हैं । प्यार तो दिल मे होता हैं और उसे दिखावे की जरूरत नही । ये जानते हुए भी, कि वो कभी लौट कर नही आयेगी, मैने उसे जाने दिया । और शायद ही अब कभी उससे मुलाकात हो ।

ना जाने अब उनसे मुलाकात कब होगी ॥
निकल पडे है हम भी अजनबी राहों पर ॥

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

इकरार भी कैसा कराया



इकरार भी कैसा कराया उस जालिम ने, जरा देखो तो सही ॥
रोकना पडता है अश्कों को भी पलकों पे मचलने से पहले ।।

तेरा दीदार करते ही



तेरा दीदार करते ही रब का ख्याल आया ॥
अब ना कोई हसरत बाकी रही दिल में ॥

शनिवार, 12 नवंबर 2011

स्वीटी - सिर्फ तुम


स्वीटी,

सिर्फ़ एक याद बनकर रह गई हो तुम । हम तो तुम्हारी यादों को इस दिल से लगाए बैठें है । आखिर कब तक इस दिल को यूं ही तडपना होगा तुम्हें याद करके ।

लोग कहते है एक बार शराब चख लो, सारे गम भूल जाओगे । और जो नही पीता, उसे पिलानें वाले भी बहुत मिलते है । लेकिन तुम्हारा ख्याल करते ही बस यही सोचता हूं कि जिसने तुम्हारी आंखों की शराब को चख लिया, उसके लिए कोई नशा बाकी ना रहा । और फिर वो नादान क्या ज़ानें कि……

" ज़ाम छूते ही आता है ख्याल मेरे दिल मे,
तौहीन ना हो ज़ाए कही उनकी निंगाहो की "

एक ही तमन्ना है इस दिल की । बस एक बार दीदार हो जाए उनका, तो इस दिल को सुकून मिल जाएगा । अब तो एक ही गुजारिश करते है…………

" मज़बूर करके मेरे दिल को यार ले चलो
उसकी गली मे फ़िर मुझे इक बार ले चलो "

उम्मीद तो नही है कि उनसे मुलाकात होगी । लेकिन खुदा इतना भी बेरहम नही हो सकता । कभी-ना-कभी, कहीं-ना-कहीं तो वो ज़रूर मिलेंगी इन नज़रों को ।

अब तो बस तुम्हारी यादों के सहारें ही ज़िंदगी कट रही है । ऐसा कोई पल नही, जब तुम्हारी याद इस दिल को ना छूती हो । कभी तुम्हारी बातें, कभी तुम्हारी यादें । बस यूं ही कट जाएगी ये ज़िंदगी अब तुम्हारी यादों के साथ…………

" और तो कौन है ज़ो मुझको तसल्ली देता
हाथ रख देती है दिल पे तेरी बातें अकसर "

हमारा क्या है ? तुम्हारा प्यार ना मिला तो ना सही, तुम्हारा दिया हुआ गम ही कफ़ी है ज़िंदगी गुज़ारनें के लिए ।

ना तुम मुझे समझ पाई, ना मेरे प्यार को । अगर एक को भी समझ लिया होता, तो खुदा कसम तुम्हारे कदम ही ना उठते मुझसे दूर जानें के लिए । लेकिन इस बेरहम किस्मत का क्या करें । जब किस्मत ने ही ना चाहा, तो क्या करेगा दीवाना ।

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

वो मुझे देखती थी ज़ब भी


वो मुझे देखती थी ज़ब भी
हंसती, मुस्काती रहती थी ॥
ज़ाने क्या सोचा करती थी
हरदम इठलाती रहती थी ॥
ज़ब हुआ परेशां मै थोडा
फ़िर मै उसके नज़दीक गया ॥
पूछा उससे सीधे मैने
क्यो ऐसे करती रहती हो ॥
ना बोली वो कुछ भी मुझसे
आंखो से सब कुछ कह दिया ॥
मेरे अंदर भी मौन हुआ
नज़रों ने ऐसा ज़ादू किया ॥

सब कुछ लुटा देंगे


सब कुछ लुटा देंगे हम भी तेरा प्यार पाने के बाद ॥
क्या-क्या सोचा था हमने तेरे मुस्कुराने के बाद ॥
तुम किसी और की निगाहों में बस गए ॥
और हमारे ख्वाब अधूरे रह गए तेरे ज़ाने के बाद ॥

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

वो ठंडी-ठंडी हवा


वो ठंडी-ठंडी हवा
और तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का लहराना ॥
वो छोटी-छोटी बूंदे
और तुम्हारा शरमा ज़ाना ॥
वो बादल का गरज़ना
और मेरे सीने से लिपट ज़ाना ॥
आज़ भी याद आता है
तुमसे मिल कर बिछुड ज़ाना ॥

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

ना आना तुम कभी



ना आना तुम कभी मेरी नज़रों के सामने
ये दिल तो पहले ही लहुलूहान हुआ ज़ाता है ॥
कैसे समझाऊं इस नादां दिल को, ये तो
छोटी-छोटी बातों पर परेशान हुआ ज़ाता है ॥

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

स्वीटी : Once Again


स्वीटी,

तुम कहती थी कि विज़य तुम तो पागल हो और मै हमेशा यही कहता था मुझे पागल ना कहो स्वीटी । प्यार में लोग दिवाने होते हैं, पागल नही होते । लेकिन पागल तो मै तुम्हें समझाते-समझाते हो चुका था ।

"हमने कितनी कोशिश की, तुम्हे अपना बनाने की ।
कहां से सीखी तुमने ये अदा, ज़िद पे उतर ज़ाने की । "

ना ज़ाने क्या कशिश थी तुम्हारी आंखो में कि एक बार देखने के बाद खुद पर काबू नही रह गया था मेरा । बस यहीं सोचा था कि

" हमने पाला मुद्दतो ज़िसे अपने पहलू में ।
इक नज़र तुमने ज़ो देखा, दिल तुम्हारा हो गया । "

" विज़य, आखिर ऐसा भी क्या है मुझमें, जो तुम मेरे पीछे पागल हुए ज़ातें हो । कुछ अपना भी तो ख्याल करो । " मै क्या कहता तुमसे । अपना ख्याल तो ना जाने कब से भूल चुका था मै । अब तो बस एक ही ख्याल था तुम्हारा और अपना ख्याल क्या रखते हम क्योंकि

"अब मौत भी हमको मारेगी क्या
मार हम नज़रो की खाए हुए हैं "

स्वीटी, तुम कहती थी कि तुम्हे मुझसे प्यार है । हां स्वीटी, सच कहा था तुमने, तुम्हे मुझसे प्यार तो है लेकिन प्रेम नही है । प्यार और प्रेम मे बहुत गहरा अंतर हैं । प्यार तो इंसान जानवरो से भी करता है लेकिन प्रेम । तुम नही समझोगी, तुम समझ ही नही सकती । प्रेम को तो उसकी गहराई मे उतर कर ही ज़ाना जा सकता है । लेकिन आज़ भी तुम्हारी याद इस दिल को तडपा जाती है । बहुत याद आती है तुम्हारी ;

"खुद ही को भूल सा गया हूं मै,
क्यों इतना याद आती हो तुम्।
कभी तो सामने आ ज़ाओ मेरी ज़ान,
क्यों इतना सताती हो तुम "

तुम्हें देखकर तो उस खुदा में भी यकीन करने लगें थे हम जिसे कभी माना ही नही था ।

" हम तो खुदा के कभी कायल ना थें
तुझे देखा तो खुदा याद आया "

दिल करता था आठो पहर तुम मेरे सामनें बैठी रहो । पर ऐसी अपनी किस्मत कहां ।

"ना जी भरकर देखा और ना ही बात की
बहुत आरज़ू थी हमें, तुमसे मुलाकात की । "

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

स्वीटी : A memory

प्रिय स्वीटी,
मै तुम्हे तब से प्यार करता हूं ज़ब मैने तुम्हे पहली बार देखा था और देखकर यही सोचा था कि

"मेरे सुकूने-दिल को तो होना ही था तबाह
उनकी भी एक निगाह का नुकसान हो गया "

तुम्हे देखकर ऐसा लगा था कि यही है वो ज़िसकी मुझे तलाश थी । शायद आज़ मेरी तलाश पूरी हो गई । लेकिन वो शायद , शायद ही रह गया ।
तुम्हे याद है एक बार तुमने कहा था कि तुम मुझसे इतना प्यार क्यो करते हो विज़य ? ज़बाब नही मिल रहा था मुझे । और कुछ सवाल ऐसे होते है ज़िनका ज़बाब हमे खुद भी पता नही होता । तुम्हारा सवाल भी कुछ ऐसा ही था । मैने पहली बार सोचा कि आखिर मै तुमसे इतना प्यार करता क्यो हूं ? ज़बाब है कि बस प्यार करता हूं । क्यों करता हूं ये तो मै भी नही ज़ानता लेकिन ये ज़रूर ज़ानता हूं कि बेइंतहा प्यार करता हूं ।
और तुम मेरे करीब, इतने करीब आती गई कि मै सोचने पर मज़बूर हो गया कि

"लाऊंगा कहा से जुदाई का हौंसला
क्यों इस कदर क़रीब मेरे आ रही हो तुम "

बेइंतहा प्यार करता था मै तुमसे, ये ज़ानते हुए भी कि तुम मेरी ज़िंदगी में कभी नही आओगी । लेकिन दिल नही मानता था । बस ऐसा लगता था कि मेरे प्यार को देखकर तुम सब मज़बूरियां भूल ज़ाओगी और मेरे पास आकर कहोगी ,"मै भी तुमसे प्यार करती हूं विजय " लेकिन ऐसा कभी हुआ नही ।
ये तो मै अभी भी मानता हूं कि तुमने मुझे धोखा नही दिया । क्योकि धोखा तो अपने देते है और

" जिसका कोई हो ही ना वो धोखा किससे खायेगा "

हंसने-मुस्कुराने की तो आदत रही है हमारी। लोग तो हमारी हंसी से भी धोखा खा ज़ाते है लेकिन

" खुशी ही हो हर गम के पीछे ये ज़रूरी तो नही
कभी-कभी गम भी बन ज़ाता है मुस्कुराने की वज़ह "

-तुम्हारा और सिर्फ़ तुम्हारा विजय

बुधवार, 24 अगस्त 2011

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

अफ़साना



वो ज़ो अफ़साना-ए-गम सुनकर हंसा करते थे।
इतना रोये कि आंख का काज़ल निकल गया॥

रविवार, 12 जून 2011